में विद्रोही हूँ उत्पीड़क सत्ता को ललकार रहा हूँ
खूब समझता हूँ में खुद ही अपनी मौत पुकार रहा हूँ
मेरे शोणितकी लालीसे कुछ तो लाल धरा होगी ही |
मेरे वर्त्तनसे परिवर्तित कुछ तो परंपरा होगी ही ||
में जो उल्टे सीधे स्वरसे गाता रहता करुण कथाएँ |
सुनकर अकुलाती ही होंगी, व्यथितोंकी चिरमूक व्यथाएँ ||
मेरे स्वरसे कुछ तो मुखरित जगती दुःखभरा होगी ही |
मेरे शोणितकी लालीसे कुछ तो लाल धरा होगी ही ||
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1 comment:
बिल्कुल सही कहा। कुछ नहीं बहुत कुछ बदल जाता है ओशो कहते हैं ऐसे व्यक्ति के मात्र जीवित होने से। लेकिन एक अलग तल पर घटता है यह बदलाव।
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