Friday, March 12, 2021

भगवानदास माहौर (स्मृतिदिन १२ मार्च १९७९)


में विद्रोही हूँ उत्पीड़क सत्ता को ललकार रहा हूँ 
खूब समझता हूँ में खुद ही अपनी मौत पुकार रहा हूँ 
मेरे शोणितकी लालीसे कुछ तो लाल धरा होगी ही | 
मेरे वर्त्तनसे परिवर्तित कुछ तो परंपरा होगी ही || 

में जो उल्टे सीधे स्वरसे गाता रहता करुण कथाएँ | 
सुनकर अकुलाती ही होंगी, व्यथितोंकी चिरमूक व्यथाएँ || 

मेरे स्वरसे कुछ तो मुखरित जगती दुःखभरा होगी ही | 
मेरे शोणितकी लालीसे कुछ तो लाल धरा होगी ही || 

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1 comment:

Anonymous said...

बिल्कुल सही कहा। कुछ नहीं बहुत कुछ बदल जाता है ओशो कहते हैं ऐसे व्यक्ति के मात्र जीवित होने से। लेकिन एक अलग तल पर घटता है यह बदलाव।

तू बुद्धि दे तू तेज दे

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